समर्पण


एक क्षण मे बदल जाता है जीवन जब समर्पण का होता है| एक माला, एक शब्द, एक तस्वीर| गुरु स्थान गुरु शब्द गुरु धर्म बन जाता है साधक का जीवन| जो इस अनमोल पल को भी ना समझ पाए तो वह जीवन जी कर भी विफल रहता है| समर्पण मन चित्त और खुलेपन का है|

संसार सिर्फ़ इंसान को हार या जीत पर जीने की कला बताती है| हारा हुए इंसान को संसार अलग दायरे मे देखती है| हार मान का है, मन का है, यही हार इंसान को तोड़ देती है| परिवार, समाज और धर्म इंसान को भिखारी के रूप मे देखना पसंद करती है| याचक के रूप मे जीने के लिए विवश करती है| मांगना उसकी मजबूरी बन जाती है| जीता हुआ इंसान हारे हुए इंसान को दबाता है, शोषण करता है| जीत इंसान को शोषण मे आनंदित होना समाज ही सिखाती है, जो हारे हुए इंसान मे द्वेष , घृणा, क्रोध,और आशाए पैदा करती है| समाज ने दायरा पैदाइश से पहले ही हार और जीत का शृंखला धर्म और नीति का प्रयोग करके किया है|समर्पण का कोई भी दायरा समाज, धर्म और नीति नही सीखती|यही कारण है, मानव हर क्षण जीवन की दौड़ मे लगा रहता है पैदा होने से लेकर मृत्यु तक, और मृत्यु से भी परे, नीति, समाज और धर्म इंसान का पीछा नही छोड़ती|

जब भी कोई विरला इंसान समर्पण के समीप आता है, उसी क्षण समाज, धर्म और नीति अपना कार्य शुरू कर देते है| समर्पण का दर्शन मानस चित्त से समबंधित है| मन ही मानव को मान से स्वमान की तरफ़ ले जाती है| यही एक दायरा इंसान को बदलने मे मजबूर करती है| बदलाव नियती का रास्ता है जो मानव को मानस-चित्त से अवगत कराती है| यही मानस चित्त से ही समाज और धर्म डरता है| मानस चित्त मानव को समर्पित अवास्ता मे अगर्सर करती है| यही समर्पण अवास्ता मानव को मानवीय दर्शन से जोड़ती है |

यही मानव का पहला अंतर गुरु है, जो मन को चित्त से जोड़ कर जागृत अवास्ता की ओर ले जाती है| अंतर मन के गुरु की खोज बहिय गुरु के दर्शन के द्वारा पूर्ण जागृत हो कर प्रकश्मय हो कर, जगत को रोशनी मे  डुबो देती है|

बाहिय गुरु का एक क्षण का दर्शन, एक क्षण का आशीर्वाद मानव का जीवन पूर्ण रूप से बदल देता है| गुरु के शब्द, माला, प्राथना, भावचित्र का कोई मोल नही है क्यों की वे बिना शर्त के और पुर्न्तय अकारण है|

अंतर मन से जागृत इंसान को ही बहिय गुरु के आशीर्वाद के वेगता और गहराई गृहन करनी की क्षमता होती है| सोए हुए इंसान या समाज या धर्म या नीति से बँधे हुए इंसान को कुछ नही महसूस होता| सुप्त अवस्था मे इंसान अपने आप को पूर्णतया ढक के रखता है धर्म से नीति से और सामाजिक बांधनो से| इन सब के साथ अहंकार और अहम भाव इंसान को पूर्ण रूप से मूढ़ ही रखता है|

हज़ारो सालो मे कोई फ़र्क नही आया| जागृत इंसान आए, पूर्णता हासिल करने के बाद गुरु बने, सत्य का मार्ग दिखाया मगर करोड़ो इंसान सो रहे थे| अब भी सो रहे है| गुरु की आशीष, प्राथना और आशीर्वाद वर्षाकाल की बरिश की तरह लोगो ने ग्रहण किया, पूर्ण रूप से ढके हुए सूखे हुए| एक बूँद भी नही गिरी उन पर, एक क्षण के लिए भी अगर ठंडक महसूस हुए तो उनको लगा की पा लिया, पहुँच गये| सूखे ठंडक महसूस हुए कई लोग ने अपने आप को गुरु मान लिया और बस सूखे गुरु सूखे लोगो को ठंडक के बारे मे बताने लग गये|

कुछ लोग थे जो जागने की चेस्टा कर रहे थे| उन्होने तैयारी की| स्वीकार करने की भाव के साथ जुड़े, अपने अहंकार के आवरण को उतारा निर्वस्त्र हो कर, ग्रहण करने के मनोभाव से, चित्तभाव से सत गुरु से पहली बारअवगत होते है| यही क्षण मे मन श्रद्धा और विश्वास का प्रस्फुतन होता है| शरीर समन्व्य हो जाता है, सिर, मन चित्त गुरु के सामने झुकता है| झुकता है गुरु के सामने पूर्ण रूप से उड़ने के लिए, जागृत होने के लिए| सुप्त अवस्था मे झुकने मे सिर्फ़ शरीर झुकता और अहम कहता है की तुम झुके, मानस चित्त से जब इंसान झुकता है तो मन कहता है आसमान खुल गया, पंख लग गये है|

बस अब सिर्फ़ आकाश को आलिंगन करना है| जो सुप्त अवस्था मे लगता था की हज़ार गुरु मिले तो हज़ार मे आशीर्वाद लेना है, फल मिले ना मिले, मगर आवरण नही छोड़ना है, अब एसा नही है| जागृत मन कहता है, मेघा बरसो, मुझे भिगो दो, मेरा शरीर, मन, चित्त सब पूर्ण रूप से समर्पित है| गुरु का आशीर्वाद लिया नही जाता, माँगा नही जाता क्योंकि गुरु आशीष सिर्फ़ बरसता है| जो वहाँ है वो भीगना चाहता है या नही यह इस बात पर निर्भर करता है की आवरण कितना बड़ा या छोटा है|

जो भीगता है, वो नहाता है, पूर्णतया शुद्धि पाता है|

अंतर मन से झुकना, चित्त को पूर्णतया को दर्शाता है|  अहंकार और अहम को हटाने की कला है| मन का मन से जुड़ने का भाव है| यही भाव है आंत: गुरु का सतगुरु  से मिलना का मार्ग है| नदी या समुंदर मे नहाने से पहले पैर से पानी मे उतरते है, पानी के लिए वह मार्ग है शरीर को शुद्ध करने का, शरीर पानी को समझता है और फिर इंसान नहा लेता है| झरने मे नहाने की कला है सिर को झुका कर उस धारा मे प्रविष्ट होना|  गुरु का आशीर्वाद भी झरने की तरह है, सिर झुका के प्रविष्ट होने पर अस्ति मे अस्तित्व आ जाता है| अस्तित्व जीवन का स्वीकार होने का, जीवित होने का, सुगंधित होने का, विस्तरित होने का|

हज़ारो सालो की, कई जन्मो की और कई मृत्यु की परते उतरने की, अंधकार से रोशनी को अग्रसर होने का मानो भाव और चित्त दर्शिता है| सुप्त अवस्था मे इंसान सिर्फ़ ‘मैं’, ‘मेरा’ और ‘मेरे अपने’ से उपर नही उठ सकता, तो आशीर्वाद एक खिलोना है जिसे वो बटोरता है और अपने बंद कोश मे चुप्पा कर रख देता है| डरता है क्यों की अगर एक खिलोना ईस्तमाल कर दिया तो आशा और आकाङ्क्षा मे कही कमी ना आ जाए| जागृत अवस्था मे इंसान ‘मैं’, ‘मेरा’ और ‘मेरे अपने’ को उस आशीर्वाद के झरने मे छोड़ देता है, और वह झरना अपने आप समर्पित को जीवन सफल बना देता है| समर्पित भाव ही मानव को बताता है की वह गुरु है, जीवित है, जागृत है|

गुरु एक दिन झरना था जो आज समुंदर है| समर्पण और विश्वास ने उस झरने को समुंदर का रास्ता बता दिया| बहते बहते झरने ने लहरो को रूप ले लिया और जब समुंदर से मिलाप हुआ तो झरना समुंदर मे लीं हो गया| अब समुंदर और झरने मे कोई फ़र्क नही बचा. यही समर्पण का सत्य है जिससे समाज, धर्म और नीति डरती है|  डर समाज, धर्म और नीति के अस्तित्व का है| भीगे हुए इंसान से गले लगने का मतलब, अपना शरीर को भी भिगाना, सो भीगे इंसान से दूर रहो, कपड़े खराब हो जाएगे| बच्चे बारिश मे भीगना और खेलना पसंद करते है| कपड़े खराब होने की चिंता उन्हे नही है, बडो को डर लगता है, कपड़ो का| आवरण की आदत बडो को ज़्यादा होती है, बच्चो मे कम|  भीगा हुआ इंसान जो खुशी से झूम रहा है वो बच्चा है| बच्चा ने कुछ पाया, बहुत कुछ पाया तो वो सब को बताएगा| वो छुपाना नही जानता, बताएगा सब को की झरना कहाँ है, दिखाएगा| सरलता है उसके बताने मे, सहजता है उसके उदेश्य का, यही ही गुरु का रास्ता भी है| झरना और समुंदर बहते रहते है और लोग वहाँ जाते है, भीगने के लिए, नहाने के लिए| नहाने के बाद इंसान तरोताज़ा हो जाता है| गुरु के आशीर्वाद को पूर्ण रूप से ग्रहण करने पर अंतर मन का मूल अंकुरित हो जाता है| समर्पण शरीर के झुकने से शुरू हुआ, अंतर मन के जागरण से चित्त का ऊर्ध्व यात्रा  की शुरुवात होती है|

आशीर्वाद अवतरण है शून्यता का, शून्यता अपने अंतर चित्त से अन्तर्मुखिये चित्त तक और फिर यात्रा परत दर परत सूक्ष्म से  अतिसूक्ष्म चित्त की ओर| तुम झुकोगे और तुम गुरु के करीब आ जओगे| गुरु तुम मे उत्तरता है, यही अवतरण है, गुरुभाव है, इसी क्षण शिष्या पैदा होता है| सुप्त इंसान जो अंतर मन से झरने मे गया था, झुक के वह गुरु का हो गया| गुरु मे गुरुत्व है जो किसी परिश्रम से नही, सहजता से प्राप्त होता है,प्रेम से प्राप्त होता है|      ~ मैत्रेय रुद्राभायानंद

Soul Searchers intends to raise the consciousness of people and to help create a turning point on this planet—a world where people are in tune with their inner-selves, living healthy and creative lives and are no longer swayed by religious dogma or politics.  The purpose is to bring the state of righteousness (dharma) back again in current state of political turmoil and selfishly motivated people.  We believe the truth can be known and realized through guided and workable ways. Thousands have benefited from the process of initiation and share them with your friends and family and together we’ll touch and transform lives.

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